भारत के प्रमुख कला और संस्कृति

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भारत के प्रमुख कला और संस्कृति


सैकडों, हजारों पीढियों के दौरान मानव समाज के रूप में हमारे विकास की प्रक्रिया के दौरान हमें कभी भी प्रत्येक पीढी के लिए नई संस्कृति, नई भाषा या भाषा की नई लिपि के विकास या निर्माण की आवश्यकता महसूस नहीं हुई। हमने वास्तव में जो किया वह केवल हमारी पूर्व पीढियों द्वारा प्रदान किये गए आधार पर ही इसका विकास किया। हम हमेशा हमारे पूर्वजों के कंधों पर खडे हुए और हमनें भविष्य में झाँका। विश्व की पहली प्रमुख सभयता थी सिंधु घाटी सभ्यता (Indus Valley civilisation) जो 1000 से भी अधिक ऐसे शहरी केंद्रों में विकसित हुई जिसमें व्यक्तिगत स्नानघर, शौचालय, और सभी प्रमुख सडकों पर मलनिःसारण की सुविधाएं उपलब्ध थीं! और यह सब कुछ 3000 वर्ष पूर्व हुआ था – वास्तव में यह अपने-आप में एक अविश्वसनीय और अद्भुत उपलब्धि थी। बाद में वैदिक संस्कृति द्वारा सिंधु घाटी की सभ्यता को प्रतिस्थापित किया गया। हालांकि अब यह नष्ट हो चुकी है फिर भी हाल के उत्खननों ने स्पष्ट रूप से उस काल की कलाकृतियों और संस्कृति को दर्शाया है, और संभव है कि इनसे हमें और भी सुखद आश्चर्य मिल सकते हैं।

भारत का एक गहरा इतिहास है, जो कम से कम १०,००० वर्ष प्राचीन है. कला, संस्कृति और साहित्य की विविधता बदलते समय, परिस्थितियों और आक्रांताओं की सोच के मुताबिक बदलती रही। वे हमें हमारे बदलते जीवन का इशारा भी करती हैं. संस्कृति हमारी कला और साहित्य में, धार्मिक प्रथाओं में और यहाँ तक कि हमारे मनोरंजन और आमोद-प्रमोद के तरीकों में भी झलकती है।

हम उतने ही हमारी संस्कृति के उत्पाद हैं, जितना संस्कृति हमारी उपज!

यदि हम हमारे देश में मनाये जाने वाले विभिन्न त्योहारों पर दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि हालांकि क्षेत्र के अनुसार इन्हें मनाने के तरीके अलग-अलग हो सकते हैं परंतु मुख्य रूप से एक कृषि प्रधान समाज में इनकी विषयवस्तु और सार समान है। भारत के लगभग प्रत्येक क्षेत्र का अपना फसल कटाई का पर्व है, जिसे अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है। भारत के संगीत, कला रूप, नृत्य और नाटक असंख्य रंग लेते हैं और मनुष्य का एक संपूर्ण जीवन भी उन्हें समझने, सीखने और यहाँ तक कि उनका आनंद लेने के लिए भी पर्याप्त नहीं होगा।

संस्कृति भौतिक भी हो सकती है और अभौतिक भी हो सकती है। भौतिक संस्कृति का संबंध हमारे जीवन के भौतिक पहलुओं से है जबकि अभौतिक संस्क्तिति का संबंध हमारे विचारों, विचारधाराओं और विश्वास से है। जो हमारे अस्तित्व में गहराई तक व्याप्त हैं, जिसके अनेकों साक्ष्य हमें प्राप्त होते हैं। भारतीय संस्कृति का सबसे अच्छा पहलु यह है कि इसका स्वरुप चिरस्थाई और सहनीय है। यह अपने अंदर अनेक संस्कृतियों को न केवल समाविष्ट करती है बल्कि उस प्रत्येक संस्कृति को अपने तरीके से विकसित और फलीभूत होने की अनुमति देती है। प्राचीन काल में हमारे देश में विभिन्न परंपराएं, रीति-रिवाज और प्रथाएं थीं। ये सभी उस काल की आवश्यकता के अनुसार विकसित हुईं क्योंकि उस समय के अनुसार वे अनिवार्य प्रतीत हुईं। इनमें से अनेक परंपराएं, और प्रथाएं आज अस्तित्व में नहीं हैं क्योंकि आज के समय के अनुसार वे अप्रचलित हो चुकी हैं। आज हमारे अनेक प्राचीन परंपराएं और रीति-रिवाज अस्तित्व में नहीं हैं, परंतु आज भी उनकी प्रतिध्वनि को हम महसूस कर सकते हैं। जब लोग अमेरिका को “मेल्टिंग पॉट” (अर्थात सबको सम्मिश्रित करने वाला घड़ा) कहते हैं तो वे मूल आद्यरूप को नजरअंदाज करते हैं – हिंदुस्तानी संस्कृति!

मंगोलों, मुगलों और ब्रिटिशों इत्यादि जैसी विभिन्न विदेशी नृजातियों के भारत पर किये गए आक्रमणों के साथ भारतीय संस्कृति में नए आयाम जुडते गए हैं, जिनमें से अनेक बलपूर्वक जोडे गए।  परंतु भारत ने कभी भी अपनी मौलिकता को नहीं त्यागा। बोलचाल और साहित्य की भाषा के रूप में हम उर्दू, फारसी और अंग्रेजी भाषा को उसी प्रकार स्वीकार करते हैं जैसे हम अपनी स्थानीय भाषा या हिंदी को स्वीकार करते हैं। यही भारतीय संस्कृति की महानता है। हालांकि ऐसा लगता है कि आज हम अपनी जडों से काफी दूर चले गए हैं।

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